कुम्भ वाली माता जी

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कुम्भ वाली माता जी

यदि किसी ने इलाहाबाद में कुछ साल बिताये होंगे तो सर्दियों के आने के साथ साथ कुम्भ मेले की याद ज़रूर ही आती होगी l ऐसा ही मेरे साथ भी होता है l आज रात का खाना खाने के  बाद पता नहीं नवम्बर के महीने में ही कुम्भ मेले की याद कहाँ से आ गयी l शायद इसलिए क्यूंकि इंग्लैंड के नवम्बर की सर्दी ही इलाहाबाद के दिसम्बर और  जनवरी के महीने से ज़्यादा होती है l बस फिर क्या, मनो कुम्भ मेले की यादो और कल्पनाओं में घंटो तक खोया ही रह गया l

जिस तरह से हर त्यौहार की एक अपनी अलग खुशबू होती है उसी तरह से इस कुम्भ के महीने की भी अपनी एक अलग खुशबू है जो की मेरे यादों में घुल सी गयी हैं और हर साल, साल के इस समय जाने कैसे यादों से निकल के साँसों के रास्ते वापस आ जातीं हैं l

संयोग से, इलाहाबाद में हमारा घर मेला क्षेत्र  में आता है, इस कारण से, हम कुछ भी कर रहे हों, कहीं न कहीं से भक्ति में डूबे हुए संगीत अपना रास्ता हमारे कानो  की तरफ बना ही लेते हैं l

बस इन्हीं सब अधभूलीं यादो के बीच में से एक अद्भुत वाक्या याद आ गया l अद्भुत इसलिए क्योकि आज के समय में नामुमकिन सा लगता है l

तो बात साल २००१ के महा कुम्भ मेले की है l महा कुम्भ मेला १२ साल में एक बार आता है l चूकि १२ साल में एक बार आता  है तो मेले का उत्साह भी १२ गुना होता है l लोगो का हुजूम भी १२ गुना होता है, सडको पे चलने की जगह नहीं होती l पूरा का पूरा गाँव टोली बना के आ जाता है गंगा स्नान करने l हर टोली का एक मुखिया होता है  हर टोली की अपनी एक निशानी होती है जैसे की कोई झंडा या किसी लम्बे से डंडे में बंधा हुआ कोई कपड़ा  ताकि अगर टोली का कोई सदस्य अलग हो जाये तो वो इस निशानी को  दूर से देख के वापस अपनी टोली में आ जाये l

इस महा कुम्भ के मेले में हर कोई कुछ न कुछ कमाने में लगा हुआ था l करोड़ों लोग बहार से गंगा स्नान कर के पुण्य कमा रहे थे और  इलाहबाद के कुछ लोग गंगा के किनारे रह रहे गरीब  लोगो को  दान दे के पुण्य कमा रहे थे और कुछ लोग करोड़ों की भीड़ में व्यापार कर के पैसे कमा रहे थे l

बस इन सब लोगो की भीड़ में मैं अपने घर के चबूतरे में अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था और मेरे दादा जी जिन्हे मैं बाबा कहता था वो चबूतरे के बहार कुर्सी लगा के दोपहर की धुप सेक रहे थे l खेलते खेलते नज़र दूर से आ रहे एक रिक्शे पर पड़ी l झल्लाया हुआ रिक्शे वाला कुछ अपने आप में ही बुदबुदाते हुए न जाने क्यों हमारे ही ओर चला आ रहा था l उसे देख के लगा कि जैसे वो अपनी मंज़िल तक पहुंच ही गया हो l अपने रिक्शे  को रोक कर और अपनी सीट पे बैठे बैठे ही पीछे पलट कर बोला “माता जी, और कहीं नहीं जा सकते हमारा किराया दे दें अब बस” l इतने में नज़र रिक्शे में बैठीं माता जी पर पड़ी l चिंता से तानी हुयी भृकुटि के बीच में से चन्दन के टीके की चमक दूर से ही दिख रही थी l माता जी ने पतले बॉर्डर की सूती साड़ी पहन रखी थी, देख के लग रहा था की मनो सैकड़ो बार धोयी और पहनी गयी हो l बायीं ओर एक पोटली नुमा झोला दबा हुआ था l झोले को देख के लग रहा था की उसमे ३ – ४ जोड़ी कपड़े रखे हों l झोले में एक फोटो फ्रेम बहार की तरह निकला हुआ था जिसमे भगवान कृष्ण की तस्वीर थी l भगवान को देख के लग रहा था की मनो वो महा कुम्भ मेले की भीड़ को देख के अचंभित हो रहे हों l

तभी रिक्शे वाले ने ध्यान अपनी ओर  खींचते हुए कहा ” भईया जी, ये माता जी मथुरा से आईं हैं l इलाहाबाद आने के बाद अपने साथियों  से बिछड़ गयीं हैं और कह रहीं हैं की उनके ठिकाने का पता नहीं है l अब आप ही बताइये अब उन्हें हम कहाँ ढूंढें”? रिक्शे वाले के प्रश्न के उत्तर में मैंने पहले उसकी तरह प्रश्न भरी नज़रो से देखा फिर माता जी की तरफ देखा और फिर मेरी नज़र बाबा पर पड़ी और मैंने उनकी नज़रो में भी प्रश्नचिन्ह को देख लिया l इसी बीच माँ जी बोलीं  ” राधे राधे भाई साहब, बहुत दूर से आये हैं हम l सूरज भी ढलने लगा है और अब हम जाएं  तो जाएं कहाँ समझ में नहीं आ रहा है l क्या आप कुछ मदद कर सकते हैं”? इतना सब हो ही रहा था की मेरी दादी भी बहार आ गयीं l उनको भी भनक लग गयी थी की बहार कोई आया है l फिर बाबा ने दादी को सारा ब्यौरा दिया और माता जी से पूछा “आप को कैसी मदद चाहिए”? माता जी बोलीं “सूरज ढल चूका है और शाम का पाठ भी नहीं किया, अगर रात बिताने की जगह मिल जाती तो बहुत उपकार होता सुबह अपने साथियों  को ढूंढने चले जायेंगे ” l ये सुन कर बाबा ने दादी की तरफ देखा, दादी के चेहरे के भाव में चिंता की लकीरें दीख रहीं थी l कुछ देर शांति रही फिर दादी ने कहा “ठीक है, आप का इंतज़ाम हम कर देते हैं “l कुछ देर की शांति में मुझे ये एहसास हुआ जैसे की दादी और बाबा ने बिना शब्दों के ही आपस में बात कर ली हो और अंतिम नतीजे पे दोनों की सहमति हो l दादी की बात सुन के रिक्शे वाले के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, उसने अपना मेहनताना लिया और चला गया l

माता जी घर के अंदर आयीं और उन्होंने पूछा “क्या हमे एक कुर्सी मिल सकती है ? हम अपने ठाकुर जी को बिठाएंगे और पाठ करेंगे ” l हमारे घर में उस समय सोफा के अलावा चार फाइबर की कुर्सियां थीं जिसको ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाता था l उनमे से एक कुर्सी मुझे माता जी को देने के लिए बोला  गया l चूँकि कुर्सी का इस्तेमाल भगवान् की पूजा के लिए करना था इसलिए उसे अच्छे से साफ़ करने का भी आदेश था l आदेशानुसार मैंने अपना काम किया और कुर्सी बैठक के कमरे में ला के रख दी l माता जी ने उस पर लाल कपड़ा बिछाया अपने ठाकुर जी को बिठाया और लगभग आधे घंटे का पाठ किया जिसमे उनका साथ दादी ने भी दिया l अब तक पापा भी ऑफिस से आ चुके थे और मम्मी शाम के नाश्ते की तैयारी भी कर चुकीं थीं l दादी ने माता जी से चाय नाश्ता के लिए पूछा तो माता जी बोली ” अगर आप सभी लोग चाय  पी रहे हो तो हम भी पी लेंगे ” l चाय बानी और उसके साथ कुछ घर का बना हुआ नाश्ता भी दिया गया l माता जी ने सिर्फ चाय पी लेकिन कुछ खाया नहीं l पूछने पर उन्होंने बताया की वो लहसुन और प्याज़ नहीं खातीं  हैं l

लहसुन और प्याज़ न खाने वाली बात सुन के मम्मी और दीदी ने सलाह मशवरा किया और निर्णय लिया की दो अलग अलग तरह का खाना बनाने से अच्छा है की सभी लोगो का खाना बिना लहसुन और प्याज़ का बने l

रात का खाना और सुबह का नाश्ता बिना लहसुन प्याज़ का बना l ईमानदारी से बताऊँ तो मुझे खाने के स्वाद में कोई ख़ास फर्क पता नहीं चला l खैर, दूसरे दिन सुबह के नाश्ते के बाद माता जी चली गयीं l और सब अपने अपने काम में लग गए l जैसे की पापा ऑफिस चले गए, मम्मी दादी घर के कामो में काग गयीं, बाबा बहार कुर्सी पे बैठ कर धुप सेकने लगे , दीदी अपने कॉलेज के काम में लग गयी और मैं थोड़ी देर पढाई किया थोड़ी देर पढाई का नाटक किया और फिर दोस्तों के साथ बहार खेलने चला गया l शाम को मैं, दादी, मम्मी और दीदी कमरे में बैठ कर बात कर रहे थे तभी बाबा कमरे में आये और बोले “वो माता जी तो फिर से आ गयीं कह रहीं हैं की अपने साथियो को खोज नहीं पायीं “l सब लोगो ने मिल के ये निर्णय लिया की एक रात की और बात है रह लेने देते हैं सुबह तो चली ही जाएँगी l शायद निर्णय सही भी था क्यूंकि करोड़ो लोगो की भीड़ में अपनी टोली ढूंढना समुद्र में मोती ढूंढने के सामान था, नामुमकिन नहीं था मगर आसान भी कहाँ था l

दादी माता जी से बोली “कोई बात नहीं बहिन जी, आज यहीं रुक जाईये कल चली जाईयेगा “l इससपर  माता जी ने बोला  ” राधे राधे बहिन जी, बहिन जी हम अपने साथियों को ढूंढ नहीं पाए हैं, और लगता भी नहीं है ढूंढ पाएंगे l हमारे पास ज़्यादा पैसे भी नहीं हैं की किसी आश्रम में जा के रहें l क्या हम कुछ दिनों के लिए यहां रह सकते हैं ? सिर्फ रात बिताने के लिए ही आया करेंगे सुबह चले जाया करेंगे, खाने के लिए भी परेशान नहीं करेंगे, बहार से दूध लेते आया करेंगे बस वही रोटी से खा लिया करेंगे “l

माता जी की बात सुन कर दादी कुछ बोल नहीं पायीं l शायद मना  करने का बहाना ढूंढ रहीं थीं और कुछ मिल नहीं रहा था या फिर सोच रहीं थीं की परिवार के बाकि लोगो को कैसे बताये की माता जी और कुछ दिन रहना चाहती हैं l

माता जी को कोई जवाब नहीं मिला और माता जी ने फिर से प्रश्न पूछा भी नहीं l लेकिन  घर की चार कुर्सियों में से एक कुर्सी माता जी के ठाकुर जी को समर्पित हो गयी, सुबह और शाम में कई बार राधे राधे की आवाज़ कानो को सुनाई दे जाती थी और साथ ही साथ  कुछ दिनों के लिए लहसुन प्याज़ का खर्चा भी बचने लगा था l अब हर शाम बैठक के कमरे में ठाकुर जी का पाठ होने लगा था l

कुम्भ मेला अब समाप्ति पर था l लगभग सरे स्नानोत्सव जा चुके थे और परिवार के सभी लोग हर शाम इंतज़ार करते थे की आज माता जी कहेंगी की मथुरा वापस जा रहे हैं l लेकिन माता जी जाने का नाम नहीं ले रहीं थीं l

लगभग एक महीने हो गया था और पता लगाना भी ज़रूरी था कि माता जी कब जाएँगी l अब ये काम मम्मी को सौंपा गया l ये काम सुनने में आसान लगता हैं लेकिन किसी से ये पूछना की ‘आप मेरे घर से कब जायेंगे’ इतना भी आसान नहीं होता है l

मम्मी ने किसी तरह से पता लगाया की माता जी अगले हफ्ते चली जाएँगी l अगला हफ्ता आया और माता जी ने सब का ध्यन्यवाद किया मुझे और दीदी को आशीर्वाद दिया और साथ ही साथ पचास पचास रूपए दिए l और फिर चली गयीं

साधारण सी लगने वाली ये घटना अगर सोचें तो उतनी भी साधारण नहीं लगती है l एक अपरिचित इंसान आप के घर आता है, एक महीने रहता है और फिर चला जाता है l सचमुच अद्भुत ही है l आज के समय में मेरे घर कोई अनजान व्यक्ति अगर आता है तो शायद मैं कभी भी उसको अपने घर में रहने न दूंगा और सारा दोष आज कल के माहौल को दे के खुद को निर्दोष सावित कर दूंगा, और शायद ही कोई होगा जो मुझे गलत कहेगा l

माहौल को तो महेश बिगड़ते हुए ही देखा है l मैंने कभी नहीं सुना की पहले माहौल बिगड़ा हुआ था अभी अच्छा हो गया है l माहौल तो शायद बना ही बिगड़ने के लिए है l सच तो ये है की कुछ अनहोनी का डर  उस समय भी था आज भी है l

फिर या तो बुज़ुर्गो का एक दूसरे पे भरोसा, या सही इंसान पहचानने की कला, या फिर शायद महा कुम्भ मेले का वातावरण ही ज़िम्मेदार था ऐसी घटना को घटित करवाने के लिए l इस भूली  बिसरि घटना को लिखना ज़रूरी था l ऐसी घटनाओं से ही तो पता चलता है की इंसानियत तो अभी भी हैं हम सब में बस भरोसा कहीं खो गया है l

अंकित

नवम्बर 2017

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