‘तुरुप का पत्ता’

अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव का फैसला आये दो दिन बीत चुके हैं। डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने चुनावी प्रचार में जातिवाद/नस्लवाद का जो ट्रम्प कार्ड फेंका था, उसने आज उन्हें वैश्विक स्तर पर एक महारथी बना दिया है। ट्रम्प समर्थक जनता खुद को असहिष्णु कहाने में अब कोई गुरेज़ नहीं कर रही है। बीते दो दिनों में पूरे अमेरिका में अलग अलग जगह पर जातिवाद की कई घटनाएं सामने आयी हैं। कुछ लोगों को तो जैसे मनमानी करने का लाइसेंस मिल गया हो।

चुनावी नतीजे आते ही एक ऐसी ही घटना नॉर्थ कैरोलिना में हुई जहां दीवार पर किसी ने नस्लवादी टिप्पणी पेंट की हुई थी: “अश्वेतों के जीवन का कोई मूल्य नहीं, न ही उनके वोटों का”। एक अन्य घटना में साउथ फिलाडेल्फिया में “Seig Heil” का नारा एक दुकान के दरवाज़े पर लिखा मिला। “Seig Heil” एक जर्मन फ्रेज (वाक्यांश) है जिसका अर्थ है “विजय की जय हो”। एक समय में “Seig Heil” का प्रयोग नाज़ियों द्वारा हिटलर को सलामी देने के लिए किया जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस वाक्यांश का सार्वजनिक प्रयोग आपराधिक करार दिया गया था। वर्तमान समय में जर्मनी में “Seig Heil” कहने पर या लिखने पर तीन साल तक की कै़द तक का प्रावधान है। ऐसे में इस नारे का प्रयोग क्या कोई इशारा है?

सर्वप्रथम, ट्रम्प ने अपनी कैम्पेनिंग के दौरान बढ़-चढ़ कर नस्लवाद, जातिवाद, रंगभेद और लिंगभेद को बढ़ावा दिया। इस पर अभिजात वर्ग के लोगों ने बहुमत में सोशल मीडिया के ज़रिये ‘ट्रम्प विचारधारा’ की आलोचना की। न्यूज़ चैनलों ने भी ट्रम्प के बड़बोलेपन की निंदा की। सभी प्रगतिशील विचारधाराओं को पीछे छोड़ते हुए, अलगाववाद की राजनीति का डंका बज उठा और आश्चर्यजनक रूप से ट्रम्प-विजय की घोषणा हुई। सच ही है, लोकतंत्र में बहुत बड़ी ताकत होती है।

प्रश्न ये है कि ये संभव कैसे हुआ? विश्व के सबसे शक्तिशाली कहाने वाले राष्ट्र की जनता एक बिना अनुभव वाले और घृणा करने वाले को अपना नेतृत्व करने की बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे दे सकती है? क्या इसका अर्थ है कि अमेरिकी जनता ट्रम्प के विचारों से सहमत है? या फिर आम लोगों के बीच, धर्म, जाति, प्रांत अथवा लिंग को लेकर, ‘सर्वश्रेष्ठ की उत्तरजीविता’ (survival of the fittest) की विचारधारा कुछ इस तरह से व्याप्त हो चुकी है कि वो खुद को सर्वक्षेष्ठ और दूसरों को निम्न समझते हुए, दूसरों को अधिकारों के हनन पर तुले हुए हैं। यदि ऐसा है, तो ये विचारणीय है। जिन लोगों ने ट्रम्प के पक्ष में अपने बहुमूल्य मत दिए उनका कहना है कि देश की वर्तमान परिस्थितियों से तंग आ कर उन्होंने ऐसा किया। अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या बीते कई वर्षों में बढ़ती गयी है जिससे वहाँ के मूल निवासियों को लगता है कि उनकी नौकरियाँ खतरे में हैं। जिनकी नौकरियाँ किसी कारण से चली गयी हैं उन्हें लगता है कि उनकी नौकरियाँ अप्रवासियों ने उनसे छीन ली हैं। साथ ही साथ आये दिन हो रहे आतंकी हमलों ने भी आम अमेरिकियों को बुरी तरह डरा दिया है। बढ़ते आतंकवाद और घटती नौकरियों को ट्रम्प ने अपने चुनावी कैम्पेन में अच्छे से भुनाया था, जिसका नतीजा आज सामने है।

बहरहाल, ट्रम्प का राष्ट्रपति चुनाव जीतना न सिर्फ अमेरिका के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए बड़ा राजनैतिक काया-पलट है। लेकिन उससे भी अहम है इस जीत को संभव बनाने वाली जनता और उनकी सोच। उम्मीद है कि अपने पद की गरिमा बनाये रखते हुए ‘मिस्टर प्रेजिडेंट’ अपने कार्यकाल में ऐसा कोई कदम न उठाएं जो सीधे तौर पर लोगों को उनपर उंगली उठाने का मौका दे या फिर अमेरिकी सरकार को शर्मसार करे। पर अब उनके समर्थकों को मनमानी से कौन रोकेगा?

आरोही
11/10/2016

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4 Comments

  1. सत्य कथन, सम्पूर्ण विश्व की राजनीति, जनता की अहनशीलता, और मानवता निरंतर अवरोहित होती जा रही है, और भावनाएं हमारे निर्णयों पर छा रही हैं। यह दुःखद है।

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  2. सही अवलोकन और विश्लेषण..राजनीति के साथ साथ सामजिक सोच की दिशा भी अब प्रश्न चिन्ह के घेरे में आती जा रही है..

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